महात्मा गांधी को भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में सत्य और अहिंसा के पुजारी के रूप में जाना जाता है। परंतु उनके जीवन का एक पहलू ऐसा भी है जो हमेशा विवादों में रहा है—उनके "ब्रह्मचर्य प्रयोग" । गांधीजी ने अपने जीवन में सत्य और आत्मसंयम की खोज के लिए कई प्रयोग किए, जिनमें सबसे चर्चित और विवादास्पद उनके ब्रह्मचर्य संबंधी प्रयोग रहे। गांधीजी का ब्रह्मचर्य का संकल्प 1906 में गांधीजी ने ब्रह्मचर्य का व्रत लिया। उनका मानना था कि आत्मशुद्धि और सत्य की साधना के लिए इंद्रियों पर नियंत्रण आवश्यक है। उनके अनुसार, यौन संबंध या वासना का त्याग उन्हें अधिक आध्यात्मिक और सार्वजनिक जीवन के लिए समर्पित बनाएगा। उन्होंने स्वयं कहा था: "ब्रह्मचर्य केवल स्त्री-पुरुष के बीच शारीरिक संबंध से परहेज़ करना नहीं है, बल्कि मन, वचन और कर्म से यौन वासना पर विजय प्राप्त करना है।" ब्रह्मचर्य प्रयोगों की शुरुआत शुरुआत में गांधीजी ने साधारण संयम का पालन किया। लेकिन समय के साथ उन्होंने इसे एक वैज्ञानिक प्रयोग का रूप दे दिया। उनका मानना था कि यदि वे आकर्षक स्त्रियों और युवतियों के साथ रह...